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लगभग 100 वर्ष पुरानी आस्था
स्थानीय मान्यता के अनुसार, आज से लगभग 100 वर्ष पहले इस पावन स्थान पर भगवान शिव का एक स्वयंभू शिवलिंग विराजमान था। समय के साथ वह स्थान और शिवलिंग धीरे-धीरे क्षीण तथा अदृश्य होता गया, लेकिन श्रद्धालुओं की स्मृतियों में उस पवित्र स्थान की कथा बनी रही।
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सिद्ध पुरुष का आगमन
कहा जाता है कि एक समय सहारा स्टेट्स में एक सिद्ध पुरुष आए। उन्होंने उस प्राचीन स्थान की पहचान की और श्रद्धालुओं से कहा कि यहाँ पुनः भगवान शिव की स्थापना कर मंदिर बनाया जाना चाहिए।
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शिवलिंग की पुनः स्थापना
कॉलोनी के कुछ श्रद्धालुओं ने मिलकर भगवान शिव की पुनः स्थापना और मंदिर निर्माण का कार्य शुरू किया। सिद्ध पुरुष द्वारा बताए गए स्थान से शिवलिंग को लाकर स्थापना की तैयारी की गई।
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रात में आते थे सर्प
स्थानीय पुजारी जी के अनुसार, जब शिवलिंग को कुछ समय के लिए उनके यहाँ रखा गया, तब रात में उस स्थान पर कुछ सर्प आते थे। श्रद्धालुओं ने इसे शिव से जुड़ी एक रहस्यमयी घटना के रूप में अनुभव किया।
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प्राण-प्रतिष्ठा और मंदिर निर्माण
विधि-विधान, मंत्रोच्चार और श्रद्धा के साथ शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की गई और मंदिर निर्माण आगे बढ़ा। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इसके बाद सर्पों का नियमित आना बंद हो गया।
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आज भी नाग-नागिन के दर्शन की मान्यता
मंदिर के पुजारी जी बताते हैं कि कभी-कभी जब मंदिर खाली रहता है, तब दो सर्पों का जोड़ा मंदिर में आकर दर्शन करता है। इसे मंदिर की लोक-आस्था और शिव के नाग-स्वरूप से जुड़ी परंपरा के रूप में देखा जाता है।
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श्रद्धालुओं का योगदान
मंदिर निर्माण में जिन-जिन श्रद्धालुओं ने श्रम, समय, धन, सेवा या किसी अन्य रूप में योगदान दिया, उनकी सामूहिक आस्था इस मंदिर की नींव का हिस्सा बनी।
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मनोकामनाओं का विश्वास
मंदिर से जुड़े श्रद्धालुओं की मान्यता है कि सच्चे मन से मृत्युंजय महादेव से प्रार्थना करने पर भोलेनाथ अपने भक्तों की मनोकामना सुनते हैं। वर्षों में असंख्य श्रद्धालुओं ने यहाँ दर्शन, पूजा और दान-पुण्य किया है।